तेल, रक्षा और भू-राजनीति: पुतिन दिल्ली में मोदी से क्यों मिलने जा रहे हैं

2025 के अंत में, व्लादिमीर पुतिन (रूस के राष्ट्रपति) दो दिन के दौरे पर भारत आ रहे हैं। उनकी यह यात्रा सिर्फ औपचारिक मुलाकात नहीं है, बल्कि इस दौरे को अब तक की सबसे संवेदनशील और रणनीतिक यात्राओं में से एक माना जा रहा है। आइए देखें कि क्यों यह दौरा इतना ज़रूरी है — और भारत के लिए इसके क्या मायने हो सकते हैं।


🔹 1. ऊर्जा सुरक्षा — भारत की बढ़ती ज़रूरतें

  • पिछले कुछ सालों में, रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल (crude oil) सप्लायर बन गया है।
  • यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद, रूसियों को अपनी तेल–गैस आपूर्ति चैनल बनाए रखने के लिए भारत जैसा ग्राहक बहुत मायने रखता है।
  • भारत के लिए, यह एक तरह से “ऊर्जा का भरोसेमंद स्रोत + कीमत में स्थिरता” सुनिश्चित करने जैसा है — जो बढ़ते वैश्विक तेल दाम और बाजार अस्थिरता को नियंत्रित करने में मदद करता है।

इसलिए, ऊर्जा आपूर्ति और तेल आयात — इस दौरे की प्रमुख चर्चा-विषयों में से एक हैं।


🔹 2. रक्षा व सैन्य सहयोग — सुरक्षा प्राथमिकताएँ

  • भारत की अधिकांश सैन्य खरीद और रक्षा उपकरण अब भी रूस या पूर्व सोवियत देशों से आते हैं। लगभग 60–70 % भारत की सशस्त्र-सेना के प्लेटफार्म — जेट, मिसाइल, समुद्री बेड़े आदि — रूस या सोवियत-मूल के हैं।
  • इस दौरे में, S-400 Triumf एयर-डिफेंस सिस्टम, स्पेयर पार्ट्स, अपग्रेडेशन, और संभवतः नए हथियारों — जैसे Su-57 फाइटर जेट — के बारे में वार्ता हो सकती है।
  • इसके अलावा, रूस भारत को “मॉडर्नाइज़ेशन + रख-रखाव + लोकल मैन्युफैक्चरिंग / ‘मेक इन इंडिया’” का विकल्प भी दे रहा है — जो भारत की रक्षा निर्भरता को बेहतर तरीके से मैनेज करने में मदद करेगा।

इसका मतलब: भारत अपने रक्षा प्रतिष्ठान और सैन्य तैयारियों को मजबूत करना चाहता है — और रूस इस साझेदारी का सबसे भरोसेमंद स्रोत बन सकता है।


🔹 3. भू-राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संतुलन

  • वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, पश्चिमी देश रूस से दूरी बना चुके हैं, और रूस को नया आर्थिक और राजनीतिक सहारा ढूँढने की ज़रूरत है। पुतिन का भारत दौरा यह संदेश देता है कि रूस के लिए भारत चीन के अलावा एक भरोसेमंद विकल्प है।
  • भारत, दूसरी ओर, अपनी “रणनीतिक स्वायत्तता” बनाए रखना चाहता है — यानी, किसी एक ध्रुव (पश्चिम या रूस/चीन) पर पूरी तरह निर्भर न होना। इस दौरे से भारत यह दिखा रहा है कि वह अपनी विदेश-नीति में लचीला और स्व-निर्णयकर्ता है।
  • इसके अतिरिक्त, भारत-रूस साझेदारी विश्व स्तर पर शीत-युद्ध-पूर्व के द्विपक्षीय ढाँचे को फिर से जीवंत करने की दिशा में एक संकेत है — खासकर उन देशों के लिए जो “ग्लोबल साउथ” में खुद को सक्रिय अथवा आत्मनिर्भर देखना चाहते हैं।

इस प्रकार, यह दौरा सिर्फ द्विपक्षीय नहीं — बल्कि भू-राजनीतिक रीसेट का भी हिस्सा हो सकता है।


🔹 4. व्यापार, आर्थिक सहयोग और विविधीकरण

  • भारत और रूस पिछले सालों में व्यापार बढ़ाने की कोशिशों में रहे हैं। अब तक, व्यापार संतुलन काफी झुका हुआ है — क्योंकि भारत ज्यादातर तेल और ऊर्जा आयात करता है, जबकि उसकी रूस को निर्यात सीमित रहा है।
  • इस दौरे में, भारत नई परियोजनाएँ, निवेश, भुगतान तंत्र (जहाँ डॉलर नहीं बल्कि स्थानीय मुद्राओं या वैकल्पिक तरीकों से लेन-देन हो) — इन सब पर वार्ता करेगा, ताकि दोनों देशों का आर्थिक तालमेल मजबूत हो सके।
  • इसके अलावा, रक्षा और ऊर्जा के अलावा — जैसे टेक्नोलॉजी, स्पेयर पार्ट्स, लॉजिस्टिक्स, एमRO (रखरखाव) — क्षेत्रों में सहयोग की संभावना है।

यानी, यह दौरा सिर्फ राजनीतिक और रक्षा स्तर पर नहीं — आर्थिक और तकनीकी मोर्चे पर भी भारत-रूस रिश्तों के पैमाने को बढ़ाने की दिशा में है।


निष्कर्ष: क्यों है यह यात्रा आज ज़्यादा मायने रखती

पुतिन की दिल्ली यात्रा केवल औपचारिकता नहीं — बल्कि एक रणनीतिक मोड़ है:

  • भारत के लिए — यह रक्षा, ऊर्जा और विदेश-नीति की चुनौतियों के बीच संतुलन साधने का अवसर है।
  • रूस के लिए — भारत जैसा विशाल और भरोसेमंद साझेदार खोना आसान नहीं; पश्चिमी दबाव और प्रतिबंधों के बीच यह एक बड़ा सहारा है।
  • दोनों देशों के लिए — यह नई साझेदारी, नए व्यापार, नए रक्षा व आर्थिक ढाँचे तैयार करने का वक्त है।

इसलिए, यह दौरा न सिर्फ “मुलाकात” है — बल्कि 2025–2030 के वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत-रूस संबंधों का एक नया अध्याय लग सकता है।

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